भारत रत्न : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी | हिंदी में
भारत रत्न : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1988 तिरुतनी ग्राम, तमिलनाडु में हुआ। डॉ राधाकृष्णन भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और दूसरे (1962- 1967) राष्ट्रपति थे। शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए सन 1954 में इन्हें ”भारत रत्न” से सम्मानित किया गया। उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

हेलो नमस्कार दोस्तों,
फ्रेंड्स, भारत रत्न पुरस्कार विजेताओं के बारे में आपको विशेष जानकारी देने के लिए हमने भारत रत्न पुरस्कार विजेताओं के बारे में पूरी जानकारी आपको देने का फैसला किया है। जहाँ हम आपको आज तक हुए सभी 48 भारत रत्न विजेताओं के बारे में एक एक करके उनकी जीवनी हम आपके सामने प्रस्तुत करेंगे। आज हम भारत रत्न : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी | Bharat Ratna : Biography of Dr. Sarvapalli Radhakrishnan के बारे में जानने वाले है।


भारत रत्न : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी | Bharat Ratna : Biography of Dr. Sarvapalli Radhakrishnan - Technical Prajapati

भारत रत्न : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी | Bharat Ratna : Biography of Dr. Sarvapalli Radhakrishnan - Technical Prajapatiनाम : डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन,
जन्म : 5 सितंबर 1988 तिरुतनी ग्राम, तमिलनाडु, भारत
मृत्यु  : 17 अप्रैल 1975 (आयु: 88 वर्ष) चेन्नई, तमिलनाडु, भारत
पिता : सर्वेपल्ली वीरास्वामी,
माता : सिताम्मा,
पत्नी : सिवाकमु,
संतान : 5 लड़कियाँ एवं 1 लड़का।


आरम्भिक जीवन : भारत रत्न : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

बचपन और पढाई : डॉ.राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुतनी गॉव में 5 सितंबर 1888 को हुआ था। साधारण परिवार में जन्में राधाकृष्णन का बचपन तिरूतनी एवं तिरूपति जैसे धार्मिक स्थलों पर बीता। वह शुरू से ही पढाई-लिखाई में काफी रूचि रखते थे, उनका शुरुवाती शिक्षण Christian Missionary Institute Lutheran Mission School से हुआ और आगे की पढाई Madras Christian College में पूरी हुई। डॉ.राधाकृष्णन को बचपन से ही किताबें पढने का शौक था। स्कूल के दिनों में ही डॉक्टर राधाकृष्णन ने Bible के महत्त्वपूर्ण बातों को याद कर लिया था, जिसके लिए उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान दिया गया था। कम उम्र में ही आपने स्वामी विवेकानंद और वीर सावरकर को पढा तथा उनके विचारों को आत्मसात भी किया। 


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छात्रवृत्ति और असिस्टेंट प्रोफेसर का पद : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और छात्रवृत्ति भी प्राप्त की। Christian College, Madras ने भी उनकी विशेष योग्यता के कारण छात्रवृत्ति प्रदान की। 1916 में दर्शन शास्त्र में M.A. किया और Madras Residency College में इसी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर [Assistant Professor] का पद संभाला।

सर्वपल्ली नाम धारण करने का सच : दोस्तों आपको बता दें की, डॉ. राधाकृष्णन के नाम में पहले सर्वपल्ली का सम्बोधन उन्हे विरासत में मिला था। राधाकृष्णन के पूर्वज ‘सर्वपल्ली’ नामक गांव में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में वे तिरूतनी गांव में बस गये। लेकिन उनके पूर्वज चाहते थे कि, उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के गांव का बोध भी सदैव रहना चाहिए। इसी कारण सभी परिजन अपने नाम के पहले  ‘सर्वपल्ली’ लगाने लगे थे।

पिता ने अपनी धार्मिक भावनाओं के बावजूद क्रिस्चियन स्कूल में पढ़ाया : राधाकृष्णन का बचपन तिरूतनी एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ था। उन्होंने अपने जीवन के प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे। इसके बाद उनके पिता जो पुराने विचारों के थे और उनमें धार्मिक भावनाएँ भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को Christian Missionary Institute, Lutheran Mission School, Tirupati में 1896-1900 के मध्य विद्याध्ययन के लिये भेजा। फिर अगले 4 वर्ष (1900 से 1904) की उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की। वह बचपन से ही बहुत ही होशियार विद्यार्थी थे।

डॉ.राधाकृष्णन का विवाह : उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही शादी सम्पन्न हो जाती थी और राधाकृष्णन भी इससे बच न सके और 1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह दूर के रिश्ते की बहन 'सिवाकामू' के साथ सम्पन्न हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी। अतः तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी ने उनके साथ रहना आरम्भ किया। यद्यपि उनकी पत्नी सिवाकामू ने परम्परागत रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन उनकी तेलुगु भाषा पर अच्छी अच्छी पकड़ थी तथा वह अंग्रेज़ी भाषा भी लिख-पढ़ सकती थीं।

अन्य जीवन : 1908 में राधाकृष्णन दम्पति को सन्तान के रूप में पुत्री की प्राप्ति हुई। 1908 में ही उन्होंने Bachelor of Arts की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और दर्शन शास्त्र में विशिष्ट योग्यता प्राप्त की। शादी के 6 वर्ष बाद ही 1909 में उन्होंने Postgraduate Examination in Art भी उत्तीर्ण कर ली। इनका विषय Philosophy ही रहा। उच्च अध्ययन के दौरान वह अपनी निजी आमदनी के लिये बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी करते रहे।


राजनीतिक जीवन : भारत रत्न : डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

👉 भारत की आजादी के बाद यूनिस्को में उन्होंने देश का प्रतिनिदितिव किया।

👉 सर्वपल्ली राधाकृष्णन को स्वतन्त्रता के बाद संविधान  निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया था।

👉 1949 से लेकर 1952 तक राधाकृष्णन सोवियत संघ में भारत के राजदूत रहे।

👉 वर्ष 1952 में उन्हें देश का पहला उपराष्ट्रपति बनाया गया।

👉 शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए राधाकृष्णन को वर्ष 1954 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा था।

राष्ट्रपति इसके पश्चात 1962 में उन्हें देश का दूसरा राष्ट्रपति चुना गया।

👉 जब वे राष्ट्रपति पद पर आसीन थे तब तक भारत का चीन और पाकिस्तान से युध्द भी हुआ।

👉 सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1967 के गणतंत्र दिवस पर देश को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह स्पष्ट किया था कि, वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बने रहेंगे और राष्ट्रपति बनने के लिए उनका अंतिम भाषण था। 1967 में राष्ट्रपति पद से इस्तीफा हुआ और मद्रास चले गए।

भारत रत्ना डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा लिखी गई किताबें

👉 द एथिक्स ऑफ़ वेदांत.
👉 द फिलासफी ऑफ़ रवीन्द्रनाथ टैगोर.
👉 माई सर्च फॉर ट्रूथ.
👉 द रेन ऑफ़ कंटम्परेरी फिलासफी.
👉 रिलीजन एंड सोसाइटी.

👉 इंडियन फिलासफी.

👉 द एसेंसियल ऑफ़ सायकलॉजी.

भारत रत्ना डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन की उपलब्धिया

👉 1938 ब्रिटिश अकादमी के सभासद के रूप में नियुक्ति।

👉 1954 नागरिकत्व का सबसे बड़ा सम्मान, “भारत रत्न”।

👉 1954 जर्मन के, “कला और विज्ञानं के विशेषग्य”।



👉 1961 जर्मन बुक ट्रेड का “शांति पुरस्कार”।

👉 1962 भारतीय शिक्षक दिन संस्था, हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिन के रूप में मनाती है।

👉 1963 ब्रिटिश आर्डर ऑफ़ मेरिट का सम्मान।

👉 1968 साहित्य अकादमी द्वारा उनका सभासद बनने का सम्मान (ये सम्मान पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे)।

👉 1975 टेम्पलटन पुरस्कार। अपने जीवन में लोगो को सुशिक्षित बनाने, उनकी सोच बदलने और लोगो में एक-दुसरे के प्रति प्यार बढ़ाने और एकता बनाये रखने के लिए दिया गया। जो उन्होंने उनकी मृत्यु के कुछ महीने पहले ही, टेम्पलटन पुरस्कार की पूरी राशी ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय को दान स्वरुप दी।

👉 1989 ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा राधाकृष्णन की याद में “डॉ. राधाकृष्णन शिष्यवृत्ति संस्था” की स्थापना।

दोस्तों यहां हम आपको बता दें कि, राधाकृष्णन अपनी इच्छा से फिलोसोफी पढ़ने नहीं गए थे। उन्हें अचानक ही इस विषय में प्रवेश लेना पड़ा, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति खराब थी। जब उन्हें पता चला कि उनके भाई ने उसी विद्यालय से पढ़ाई पूरी की है तो मजबूरन राधाकृष्णन को आगे उसकी फिलोसोफी की किताबें लेकर पढ़ना पड़ा था।
अंततः सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का निधन 17 अप्रैल 1975 को एक लम्बी बीमारी के बाद हो गया राधाकृष्णन के मरणोपरांत उन्हें मार्च 1975 में अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे। डॉक्टर राधाकृष्णन के पुत्र डॉक्टर एस. गोपाल ने 1989 में उनकी जीवनी का प्रकाशन भी किया।

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